
सागरमल जैन हत्याकांड के बाद हुई यूडीए की ध्वस्तीकरण कार्रवाई को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। राव समाज के पदाधिकारियों और वरिष्ठ अधिवक्ता राव रतन सिंह ने जिला कलेक्ट्रेट पहुंचकर प्रशासन की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि जिस निर्माण को बुलडोजर से ध्वस्त किया गया, वह आरोपी प्रवीण सिंह का नहीं बल्कि कैलाश कंवर राव का निर्माणाधीन मकान है। उनका कहना है कि भवन के लिए वैधानिक स्वीकृति ली गई थी और मामले में न्यायालय का स्थगन आदेश भी प्रभावी था। वरिष्ठ अधिवक्ता राव रतन सिंह ने सवाल उठाया कि यदि न्यायालय का स्थगन आदेश लागू था तो यूडीए ने किस कानूनी आधार पर कार्रवाई की। यदि निर्माण अवैध था तो पहले नोटिस क्यों नहीं दिया गया। यदि भवन किसी अन्य व्यक्ति के नाम था तो आरोपी के नाम पर ध्वस्तीकरण किस आधार पर किया गया। यदि निर्माण कई मंजिल तक पहुंच चुका था तो शुरुआती चरण में कार्रवाई क्यों नहीं हुई और बुलडोजर हत्या की घटना के बाद ही क्यों पहुंचा। राव समाज ने यह भी दावा किया कि घटना से जुड़े वीडियो की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उनका कहना है कि पूरे घटनाक्रम के सभी पहलुओं की जांच किए बिना एक पक्षीय कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। समाज ने जिला प्रशासन से मांग की है कि ध्वस्तीकरण की पूरी प्रक्रिया, नोटिस, स्वीकृति, न्यायालय के आदेश और यूडीए की कार्रवाई की स्वतंत्र जांच कराई जाए। साथ ही उन्होने कहा कि यह कार्यवाही समुदाय विशेष के दबाव में की गयी है। मेवाड़ शासक राव समाज के अध्यक्ष रोड सिंह ने भी आरोप लगाया कि प्रवीण सिंह के खिलाफ दबाव में कार्रवाई की गई है। वहीं कैलाश कंवर राव ने दावा किया कि निर्माणाधीन भवन उनका है, जिसे उन्होंने अपने नाम से खरीदी गई भूमि पर लोन लेकर बनवाया था और प्रवीण सिंह केवल निर्माण कार्य की देखरेख कर रहे थे। राव समाज ने चेतावनी दी है कि यदि ध्वस्तीकरण की वैधानिकता की निष्पक्ष जांच नहीं हुई और उनके सवालों का जवाब नहीं मिला तो आंदोलन को व्यापक रूप दिया जाएगा। अब इस पूरे मामले में कई सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या यूडीए ने ध्वस्तीकरण से पहले सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया? क्या भवन स्वामी को नोटिस दिया गया था? क्या न्यायालय के किसी स्थगन आदेश की अनदेखी हुई? क्या कार्रवाई तथ्यों के आधार पर हुई या समुदाय विशेष के दबाव में निर्णय लिया गया?